Mumbai Mein Paanch Saal Ka Rashid – Pehli Awaaz Ki Chamak
Ustad Rashid Khan biography भारतीय शास्त्रीय संगीत की उस अद्भुत यात्रा को सामने लाती है, जो पाँच साल के एक मासूम बालक की अनजानी तान से शुरू होकर उस्तादी की बुलंदी तक पहुँचती है।
पांच बरस का बालक राशिद खान मुंबई में अपने चाचा उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान साब के घर आया और बेखयाली में अपने गले से कुछ ऐसी हरक़त की, कि उस्ताद गुलाम मुस्तफा साब हैरत में आ गए । आवाज़ में मौसिकी की हर परत को पहचानने और तराशने वाले गुलाम मुस्तफा खान साब को पता चल गया की खानदान में एक खुदरंग अनगढ़ हीरा है जो तराश की कसौटी पर अगर कसा गया तो उस्तादो का उस्ताद बनने की सलाहियत रखता है ।

Badayun Wapsi aur Mama Nissar Hussain Khan Ka Sakht Riyaz
मुंबई से राशिद खान अपने घर बदायूं लौटा तो मामा निसार हुसैन खान ने इस हठीले बालक के तराश की जिम्मेदारी ले ली। सुबह ४ बजे से एक तान का रियाज चलता तो पूरा दिन , उसी तान की उतार चढ़ाव में गले की नसे फूल जाती।
इतनी रियाज़ का ये फायदा हुआ की हर राग, तान, राशिद के गले में जाते ही धीरे धीरे पकने लगते, आवाज़ जब राशिद के गले से निकलती तो आवाज़ के बदन में मुलायम रेशम की परदेदारी होती, जिसका एक कोना , शहद में तर होता ।
Kolkata Ka Safar: Bachche Se Ustad Banane Ka Asli Karishma
११ साल की उमर में ही राशिद दिल्ली के बड़े प्रोग्राम में अपनी आवाज़ के ऐसे दम खम पेश करते की लोग एक बच्चे के उस्ताद में बदलने के करिश्में के चश्मदीद हो गए। १४ साल की अधपकी सी उम्र में दरिया के एक और शहर ,कलकत्ता में राशिद खान, आईटीसी संगीत रिसर्च एकेडमी , में अपनी आवाज़ मे एक ओर लचक , दूसरी तरफ , आवाज़ में भार के साथ , खनक भर रहे थे। इन्ही राशिद की एक लयकारी ने ईश्वर जैसी आवाज वाले पंडित भीमसेन जोशी को अपनी ओर खींच लिया। पंडित जी ने राशिद की अधसिंकी आवाज़ की तासीर सुनकर बोल दिया कि राशिद की आवाज में भारत की शास्त्रीय संगीत का मुस्तकबिल जिंदा भी रहेगा और बुलंद भी। राशिद ने फौरन पंडित भीमसेन को अपना द्रोणाचार्य मान लिया और उनकी आवाज़ की हर हरक़त पर, अपने सीखने की उंगली रख दी। पंडित जी की सरपरस्ती, सलाह में राशिद तपने भी लगे और पकने भी।
कोलकाता ने राशिद खान को आवाज़ में इतनी लोच भर दी , कि सप्तम सुर की ऊंचाई पर भी राशिद खान की आवाज , लचकती थी, टूटती नही ।
Do Dariya Ke Shehron Ka Safar – Kolkata Se Mumbai Tak Ki Gunjas
आवाज़ की गूंज , एक दरिया के शहर से दूसरे दरिया के शहर यानी मुंबई पहुंची तो हर ईमानदार किस्सागो, अपनी कहानी में, राशिद खान के लिए जगह निकलने लगा। जब वे मेट का गाना , आओगे जब टीम साजना , जब गलियों चौबारों में गूंजने लगा तो राशिद खान ने शास्त्रीय संगीत की स्वीकार्यता को और बढ़ा दिया ।
मुंबई में राशिद अब राशिद नही , उस्ताद राशिद खान हो गए थे। आवाज़ अहसास का ऐसा तालमेल स्टेज पर उभरता की लोग बंद हाल में चांदनी में भीग जाते।

किसी भी फिल्मकार को जब अपनी कहानी को रूहानियत देनी होती तो वो एक गाना, उस्ताद राशिद खान साब के नाम कर देता और गाना , रूहदारी और एहसासों का खूबसूरत सरगम बन, लोगो की दिल की रग में बस जाता ।
राशिद से राशिद खान फिर उस्ताद राशिद खान बनने के सफर को शायद ही किसी कलाकार ने इतनी कम उम्र में तय किया हो। जिस शहर कलकत्ता ने , राशिद खान को बनते देखा, जिनकी ठुमरियो ने शहर के बदन में लहर पैदा कर दी, उसी शहर कोलकाता में उस्ताद राशिद खान, ढलते सूरज का कोई राग लगाने लग गए । कोलकाता में ही उस्ताद राशिद खान सिर्फ ५६ साल की उमर में , गीत का आखिरी अंतरा लिख कर किसी और दुनिया को अपनी आवाज़ की रोशनी से जगमग करने का फैसला ले लेते हैं

म्यूजिक अपने बेहद प्रिय शिष्य और दुनिया अपने उस्ताद को खोकर , बेहद गमगीन हो गया था ।
ईश्वर उस्ताद की आत्मा को शांति दें 

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