फिल्म की कहानी — बचपन और कल्पना का मेल
यह एक फिल्म नहीं, बचपन की उस पुरानी डायरी का खुला हुआ पन्ना है जिसे हमने बड़े होने की जल्दबाज़ी में कहीं रखकर भूल दिया था। द ग्रेट ग्रैंड सुपरहीरो, एलियन्स का आगमन हमें किसी दूसरे ग्रह पर नहीं ले जाती, बल्कि उस उम्र में लौटाती है जहाँ दादाजी की उँगली थामकर चलना किसी भी सुपरहीरो की उड़ान से बड़ा रोमांच हुआ करता था।

जैकी श्रॉफ का अभिनय — पर्दे पर एक पुरानी छाँव
जैकी श्रॉफ यहाँ किसी चमत्कारी नायक की तरह नहीं आते। वे उस पुराने बरगद की तरह हैं जो गाँव के नक्शे में नहीं, लोगों की स्मृतियों में खड़ा रहता है। उनकी आँखों में शरारत है, चाल में एक थकी हुई मस्ती, और चेहरे की झुर्रियों में ऐसे किस्से छिपे हैं जिन्हें सुनते हुए बच्चे यक़ीन करने लगते हैं कि दुनिया अभी पूरी तरह समझी नहीं गई है।
जैकी श्रॉफ का अभिनय इस फिल्म का सबसे मुलायम और सबसे चमकीला रंग है। वे संवाद नहीं बोलते, मानो अपने और दर्शकों के बीच कोई पुरानी दोस्ती निभाते हैं। दुर्लभ बात यह है कि वे अपने किरदार को निभाते नहीं, उसमें बस जाते हैं। उनकी मौजूदगी पर्दे पर वैसी ही सुकून देती है जैसी गर्मियों की दोपहर में अचानक किसी पेड़ की छाँव मिल जाना। उनके प्रदर्शन में एक सहज मानवीय ऊष्मा है, जो हर दृश्य को विश्वसनीयता और आत्मीयता से भर देती है।
दिपु का किरदार — अकेलेपन को जीने का तरीका
दिपु के रूप में मिहिर गोडबोले फिल्म की धड़कन हैं। नए शहरों, नए स्कूलों और बार-बार छूटते दोस्तों के बीच वह अपने अकेलेपन को कल्पना के धागों से सीता है। वह झूठ नहीं गढ़ता, वह अपने लिए एक ऐसी दुनिया बनाता है जहाँ दादाजी एलियन्स से लड़ सकते हैं और दोस्ती किसी ट्रांसफर ऑर्डर से खत्म नहीं होती। बच्चे अक्सर कल्पना इसलिए नहीं करते कि उन्हें सच से भागना है; वे कल्पना इसलिए करते हैं क्योंकि सच कभी-कभी बहुत छोटा पड़ जाता है।
निर्देशन और सिनेमाई भाषा — शोर नहीं, फुसफुसाहट
निर्देशक की सबसे बड़ी सफलता यह है कि वह इस कहानी को शोर, चमत्कार और तकनीकी तमाशे में नहीं बदलता। वह कैमरे को बच्चों की आँखों की ऊँचाई पर रखता है, जहाँ दुनिया अब भी रहस्य से भरी हुई है। फिल्म का निर्देशन एक धैर्यवान कथाकार की तरह काम करता है, जो जानता है कि कल्पना का जादू ऊँची आवाज़ में नहीं, फुसफुसाहट में जन्म लेता है। यही कारण है कि फिल्म अपने सबसे भावुक क्षणों में भी भावुकतावादी नहीं बनती।
फिल्म की सिनेमाई भाषा अपनी सादगी में प्रभावशाली है। दृश्यों की गति, फ्रेमिंग और दृश्यात्मक लय कहानी के भावनात्मक तापमान को लगातार सहारा देती है। निर्देशक दर्शक को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करता; वह उसे धीरे-धीरे इस दुनिया का हिस्सा बना देता है।

छायांकन इस दुनिया को देखने का एक विशेष तरीका रचता है। कैमरा कई बार वास्तविकता और कल्पना के बीच ऐसी महीन रेखा पर चलता है कि दोनों एक-दूसरे में घुलने लगते हैं। धूप से भरे फ्रेम, खुले आसमान, गलियाँ, घर और बच्चों के चेहरे मिलकर एक ऐसी दृश्य-स्मृति बनाते हैं जो फिल्म खत्म होने के बाद भी बनी रहती है। कई दृश्य ऐसे लगते हैं मानो किसी बच्चे ने अपनी कॉपी के हाशिये पर रंगीन पेंसिल से बना दिए हों और वे अचानक जीवित हो उठे हों।
फिल्म का प्रोडक्शन डिज़ाइन भी उल्लेखनीय है। घरों, कमरों और रोज़मर्रा की वस्तुओं में एक आत्मीयता है। यह दुनिया बनाई हुई कम और जी हुई अधिक लगती है। यही बारीकी फिल्म को विश्वसनीय बनाती है। संगीत और बैकग्राउंड स्कोर भी कथा के साथ कदम मिलाकर चलते हैं। वे भावनाओं को निर्देशित नहीं करते, केवल उनका हाथ पकड़ते हैं।
फिल्म देखते हुए कई बार गाब्रिएल गार्सिया मार्केस के जादुई यथार्थ की याद आती है, जहाँ असंभव घटनाएँ भी जीवन का स्वाभाविक हिस्सा लगती हैं। यहाँ एलियन्स का आगमन उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना यह विश्वास कि एक बच्चा अपने दादाजी को ब्रह्मांड का सबसे बड़ा नायक मान सकता है। और शायद यही सिनेमा का सबसे बड़ा जादू है कि वह हमें उस विश्वास पर हँसने नहीं देता, बल्कि कुछ देर के लिए उसमें शामिल कर लेता है।
आज जब दुनिया संदेह से भरी हुई है और हर कथा से पहले प्रमाण माँगती है, द ग्रेट ग्रैंड सुपरहीरो: एलियन्स का आगमन एक धीमी लेकिन ज़रूरी फुसफुसाहट की तरह आती है। वह कहती है कि बचपन की कल्पना कोई भ्रम नहीं, मनुष्य की पहली और सबसे विश्वसनीय महाशक्ति है।
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फिल्म जो ज़रूर देखनी चाहिए
फिल्म समाप्त होने के बाद भी जैकी श्रॉफ का वह मुस्कुराता हुआ चेहरा देर तक साथ रहता है। जैसे सांझ ढलने के बाद भी आँगन में कुछ धूप बची रह जाती है। और तब महसूस होता है कि यह फिल्म एलियन्स या सुपरहीरोज़ की नहीं, उस भरोसे की कहानी है जिसे हम बड़े होते-होते खो देते हैं, और जिसे सिनेमा कभी-कभी चुपचाप वापस लौटा देता है।
यही सिनेमा का वह दुर्लभ क्षण है जब पर्दे पर चल रही कहानी खत्म हो जाती है, लेकिन उसके भीतर छिपा बचपन दर्शक के साथ घर लौटता है।

-अविनाश त्रिपाठी
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