Dharmendra’s Biography stands as a compelling narrative of the Eternal Icon of Hindi Cinema—a journey shaped by his humble Punjab roots, unforgettable film journey, powerful screen presence, and a legacy that continues to define Bollywood’s golden era.

पंजाब की उपजाऊ ज़मीन के उस गांव में, जहां हर सुबह मैदान की हवा नई ताजगी लेकर आती थी, एक साधारण बालक ने सपना देखा — बड़े परदे पर अपनी पहचान बनाने का। यही बच्चा कल के महानायक धर्मेंद्र बना, जिसकी हर मुस्कान में सादगी और हर संवाद में दिल की गहराई थी।
शुरुआत: सपनों से सफर तक
धर्मेंद्र के बचपन का बड़ा हिस्सा गांव की गलियों, तालाबों और खेतों की मिट्टी में बीता। पढ़ाई लुधियाना में हुई, पर सपनों की उड़ान बंबई तक गई। एक दिन फिल्म की पत्रिका में अभिनेता की खोज का विज्ञापन देखकर धर्मेंद्र का मन द्रवित हुआ। बहुत से नौजवान आते हैं, लौट जाते हैं — पर धर्मेंद्र की आंखों में जो उम्मीद थी, वो आख़िरकार एक नये सितारे की रौशनी में बदल गई। फिल्मफेयर अवार्ड में सफलता मिली और ‘दिल भी तेरा, हम भी तेरे’ से उनका फ़िल्मी सफर शुरू हो गया।

सितारों की भीड़ में अलग चमक
‘बंदिनी’ जैसी संवेदनशील फिल्मों ने धर्मेंद्र को दर्शकों के करीब पहुंचाया। उनके पात्र प्रेम, दुख और संघर्ष की मर्मस्पर्शी गहराइयों में डूबे रहते। मीना कुमारी और नूतन के साथ उनकी अदाकारी हर बार दर्शकों को नया एहसास देती। ‘काजल’ में मीना कुमारी का साथ, ‘दिल ने फिर याद किया’ में नूतन के संग उनकी मोहब्बत, और ‘फूल और पत्थर’ में बिना कमीज़ के उनका पर्दे पर आना — ये सब उदाहरण हैं किस तरह धर्मेंद्र परदे पर किशोर दिलों की धड़कन बने।
शोले के “वीरू” और जिंदगी का प्यार
10वें दशक में उनके अभिनय का नया रंग देखने को मिला — अमिताभ बच्चन के साथ शोले के “वीरू” बने तो अभिनय और हास्य का अद्भुत मेल सबने देखा। यही फिल्म नायक की तरह उनकी निजी जिंदगी के लिए भी टर्निंग पॉइंट साबित हुई। हेमा मालिनी, जिनसे उनकी गहरी दोस्ती थी, बाद में जीवन की संगिनी बनीं। दोनों की प्रेम कहानी भी किसी फ़िल्मी कथा से कम नहीं थी — शूटिंग के साहसिक किस्सों और लाइटमैन को रिश्वत देकर हेमा के साथ ज़्यादा वक्त बिताने की बातें दर्शकों के बीच हमेशा लोकप्रिय रहीं।

अभिनय की विविधता और दिल का करिश्मा
‘सत्यकाम’ में धर्मेंद्र ने अपनी शक्तिशाली छवि से हटकर एक ऐसा पात्र निभाया, जो अंदर की टूटन, पश्चाताप और सच्चे प्रयास की सच्चाई को दर्शाता है। सत्यप्रिय का संघर्ष और धर्मेंद्र का भावुक अभिनय उनकी कला की ऊंचाई दिखाता है। ‘चुपके चुपके’ में हास्य की सहजता, ‘धर्मवीर’ और ‘जुगनू’ जैसी फिल्मों में उनके साहसिक रूप, सबमें उनके अभिनय की नयी छुअन देखने को मिलती है।
परिवार: परदे के साथ-साथ निजी ज़िंदगी
अपने बेटे सनी देओल को ‘बेताब’ से लॉन्च करना, बॉबी देओल के करियर को संवारना — धर्मेंद्र हमेशा एक आदर्श पिता रहे। उनका परिवार बॉलीवुड के सबसे चर्चित और पसंदीदा परिवारों में रहा। एक ओर महानायक का दर्जा, दूसरी ओर प्यार और जिम्मेदारी की मिसाल — ये दोनों धर्मेंद्र के व्यक्तित्व को खास बनाते हैं।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
धर्मेंद्र की दूसरी पारी में ‘यमला पगला दीवाना’ जैसी सुपरहिट फिल्में आईं, जिनमें उन्होंने अपनी उम्र और अनुभव को नए अंदाज में पेश किया। हर दौर में नए रंग, नई ऊर्जा और ज़िन्दगी से प्यार — यही उनकी सबसे बड़ी खूबी थी।
सम्मान और समाज में योगदान
फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित होकर उनके संघर्ष और सफलताओं को सिनेमा ने सलाम किया। दिलीप कुमार के शब्द, “काश मुझे धर्म जैसा सुदर्शन चेहरा मिला होता,” इस महानायक की सुदर्शनता और सरलता का प्रमाण हैं। धर्मेंद्र थोड़ी देर के लिए राजनीति में भी गए, लेकिन उनकी असली पहचान सिनेमा ही रहा।
धर्मेंद्र का सार्वजनिक जीवन और प्रभाव
धर्मेंद्र लगातार अपने फैंस के साथ जुड़े रहे। अपने अभिनय, विनम्रता, और मिलनसार स्वभाव के कारण वे गांव से लेकर महानगर तक हर दिल में बसे रहे। उनकी संवाद अदायगी, खासकर ‘शोले’ का “बसंती, इन कुत्तों के आगे मत नाचना,” आज भी अमर है।
अंतिम विदाई: परदे के उस पार
2025 में उनके अवसान की खबर जैसे ही फैली, पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। उनके अंतिम संस्कार में फिल्म बिरादरी, राजनेता और आम लोग सम्मान देने पहुंचे। सबकी आंखों में नमी थी, पर दिलों में यादें उजली थीं। बॉलीवुड ने एक ‘ही-मैन’ खो दिया, लेकिन उनकी रौशनी हमेशा कला जगत में जलती रहेगी।
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